Papa Katti
मम्मी, तुम पापा से कह दो
घूस के लड्डू घर न लायें
दो नंबरी पैसों की बर्फी
घिन्न आती है, कैसे खाएं?
डरे डरे खुद पापा रहते
तुम भी सहमी-सी रहती हो.
क्या जिन जिन का हक छीना था
उनकी आहें असर दिखाएँ?
पापा तुम सच्चे, अच्छे थे
सहज, सरल, प्यारे लगते थे
हँस-हँस, खिल-खिल, हिल-मिल बातें
अब न रही वे दिल से चाहें
पापा अब सरकारी अफसर
हुकम चलायें, रोब जमायें
रस्ता रोकें, टांग अड़ाएं
जैसे तैसे रिशवत खाएं.
छी, छी, पापा, कट्टी, कट्टी
छोड़ो-छोड़ो मेरी बाहें
मेरे सिर से हाथ हटा लो
तुम से बिछड़ी अपनी राहें.
बलदेव राज दावर, २०१२

