Wednesday, April 2, 2014

-:  नयी दुनिया के नए खुदा, तेरी जय हो  :-


तुम कौन हो?
जो भी हो, तुम जिन्न या भूत नहीं।
इस दुनिया में कहीं से आये नहीं।
किसी ने तुम्हें यहां  भेजा नहीं।
किसी ने तुम्हें गढ़ा नहीं,
न तुम आकाश से टपके हो।
तुम अपने माता-पिता के शरीर से उगे हो।
और तुम्हारे माता पिता,
अपने-अपने माता पिता के शरीरों से उगे थे।
तुम्हारे सीने की धड़कन नयी नहीं,
वह पीढ़ी-दर-पीढ़ी, पुश्त-दर-पुश्त,
अरबों सालों से लगातार धड़कती चली आ रही है।
तुम्हारी साँसों का सिलसिला युगों-युगों से जारी है।
तुम्हारे मन में बैठी ‘मैं’ भी बहुत-बहुत बूढ़ी है।


(2) चलो, मान लिया,
तुम युगों-युगों से बहती आ रही जीवन धारा हो,
अब अगला सवाल है,
तुम्हारा पहला-पहला पुरखा कब और कहाँ से आया था?
बीसवीं सदी की साइंस को स्पष्ट संकेत मिले हैं
कि आज से तीन-चार अरब साल पहले,
मानो, चुटकी-भर माटी से,
एक बूँद पानी से,
एक फूँक हवा से
और एक किरण धूप से
अनायास तुम्हारा गठन हुआ था  
और तुम में एक चाबी-सी भर गयी थी,
जो अब उतरना नहीं चाहती।
पृथ्वी पर जीव की शुरुआत हो गई।
तुम्हारा पहला-पहला पुरखा प्रकट हुआ।

(3) और, जो तुम्हारा पहला-पहला पुरखा था
वही बाकी सभी प्राणियों  का -
पेड़-पौधों, कीट-पतंगों और पशु-पक्षियों  का -
पहला-पहला पुरखा था।
आज की तारीख में,
पृथ्वी पर पसरे हुए, रेंगने वाले,
चलने-फिरने और उड़ने वाले,
सभी प्राणी, आपस में,
दूर-निकट के रिश्तेदार हैं।
उनकी रगों में सांझे पुरखों का खून दौड़ रहा है।
पृथ्वी पर आज, एक भी प्राणी नहीं
जो बाकी सब प्राणियों का रिश्तेदार न हो।  

(4) तुम्हारे शुरूआती पुरखों के जो फासिल आज मिले हैं
उनसे पता चलता है
कि वे प्राणी तब बहुत छोटे, सरल और सूक्ष्म थे ।
छोटे इतने कि बिना माइक्रोस्कोप के दिखाई तक न दें।   
और सरल इतने कि उनके न हाथ थे,
न पैर, न सिर, न मुंह,
मानो, उनका केवल पेट ही पेट था।  
वे प्राणी बहुत क्षणिक भी थे।
कुछ ही मिनटों में वे खा-पी कर,
और जवान हो कर,
एक से दो में बंट जाते थे।  
लेकिन तब से अब तक, तुम
और बाकी सभी प्राणी,
पीढ़ी-दर-पीढ़ी,
अनगिनत हादसों में से गुज़रे हो,
बे-शुमार तूफानों को तुमने झेला है।  
हर बार तुम हज़ारों बहन-भाइयों में से चुने गए,
और हर बार तुमने अपने को पहले से
अधिक सबल, अधिक पेचीदा और अधिक सजग पाया है।  

(5) जीव वृक्ष की शाखाओं में से शाखाएं फूटती रहीं,
और, एक दूसरे से अलग हो कर और बिछुड़ कर,
अपनी-अपनी बस्तियों में,
अपने-अपने ढंग से,
फलती और फूलती रहीं।  
करते-करते बानरों की एक शाखा,
आज से कुछ लाख साल पहले,
मनुष्य के रूप में विकसित हुई।
लेकिन इस रूप में
तुम बहुत कमज़ोर और लाचार थे,
हिंसिक पशुओं का बहुत आसान शिकार थे,
नष्ट होने के कगार पर खड़े थे।
केवल वही बचे जो फलदार जंगल छोड़ कर
झाड़ीदार मैदानों में आ बसे
और उनमें से भी वे बचे
जिन्हों ने लकड़ी, पत्थर और हड्डियों के औज़ार धारण किये।
केवल इन औज़ारों की बदौलत आज तुम
जीवजगत के लीडर हो, इस पृथ्वी के भगवान हो।  
और इस दुनिया के खुदा हो गए हो।  तुम्हें सलाम।
(6) आज तुम्हें पशु या बानर कहते हुए संकोश होता है।
लेकिन यह सच है
तुम एक सहज सरल पशु हो, जानवर हो, बानर हो।  
सभी पेड़-पौधों और पशु-पक्षियों की तरह
तुम भी अपने माँ-बाप के शारीर से उगे हो।
अपने माँ-बाप से ही तुम्हें शारीर का विधान मिला,
प्राण मिले, आँख मिली, कान मिला,
सीने में दिल मिला, सिर में दिमाग़ मिला,
दिमाग में सोच विचार मिला, और ‘मैं’ मिली।  
इस अर्थ में तुम्हारा कोई पुरखा मारा नहीं, मिटा नहीं।
जब तक तुम और तुम्हारे भाई-बहन ज़िंदा हो
तब तक अपने किसी पुरखे को तुम मरा हुआ मत मानो।
तुम्हारा जीवन तुम्हारे पुरखों के जीवन का अगला चरण है।
(7) और मनुष्य शिशु के रूप में तुम आज भी
बहुत कमज़ोर और लाचार पैदा होते हो।
महीनो-साल लग जाते हैं तुम्हें खड़ा होने में।
लेकिन इस सफ़र में तुम कभी अकेले नहीं थे,
अलग या बे-सहारा नहीं थे।
माँ की गोद से, बाप की छत्र-छाया से,
बहन-भाइयों से, संगी-साथियों से,
घर-आंगन से, गली-मोहल्ले से,
गांव-नगर से, यानी कि मानव समाज से,
पहले दिन से जुड़े हुए थे।
समाज से ही तुम्हें भाषा मिली,
शब्द मिले, शब्दों के अर्थ मिले,
कई तरह के कौशल मिले, सूझ-बूझ मिली,
कथाएं मिलीं, मान्यताएं मिलीं,
गीत मिले, मीत  मिले, हंसी मज़ाक मिला,
लाज-शर्म मिली, अच्छे-बुरे की तमीज मिली,
अगर एक शब्द में कहें तो, मानवता मिली।
और तुम्हें यह मानवता मिली केवल समाज से।


(8)  आज तुम पैदल नहीं, निहत्थे नहीं, नंगे नहीं।  
लाखों साल पहले जितने गूंगे, बहरे और अंधे नहीं।
आज तुम्हारे हाथों में अस्त्र हैं, शास्त्र हैं,
औज़ार हैं, हथियार हैं - अद्भुत टेक्नोलॉजी है।  
तुम्हारे पैरों में पहिये हैं, आँखों पर ऐनक है,
कानों पर मोबाइल है, जुबां पर माइक है
और उँगलियों में रिमोट है।  
इशारों ही इशारों में तुम इस कठ-पुतली दुनिया को
मन चाहे नाच नचा रहे हो।
तुम्हारे बनाये हुए हज़ारों नकली चाँद
पृथ्वी के आकाश में विचर रहे हैं।
तुम्हारे भेजे हुए छ: पहियों वाले रोबोट
पड़ोसी ग्रहों पर चल-फिर रहे हैं।
अंतरिक्ष में ठहराई हुई तुम्हारी दूरबीने
ब्रह्माण्ड के कोने-कोने की खोज-बीन कर रही हैं।
यंत्रों की मदद से तुम, पलक झपकने में,
यहाँ भी हो, वहाँ भी हो,
मानो, एक साथ सब जगह मौजूद हो।  
तुम मैन से सुपरमैन बन गए हो।
यह दुनिया नयी एक दुनिया हो गई  है।
और याद रखो, तुम्हारी यह ताकत प्राकृतिक नहीं,
तुम्हारे औज़ारों की देन है।  
(नंगा और निहत्था मनुष्य न हाथी जैसा विशाल है,
न शेर जैसा शूरवीर और न मोर जैसा सुन्दर।
हंसों की उड़ानें, मधुमक्खियों के नृत्य, भौंरों की भावुकता
और चींटियों की सूझ-बूझ
प्रकृति ने बेचारे मनुष्य को नहीं दी।)
तुम्हारी शक्ति तुम्हारे औज़ारों की शक्ति है।
(9) और, साइंस?
तुम्हारी साइंस की रौशनी में अंधेरे  छट रहे हैं।  
हर तरफ उजाला फैल गया है।  
इतना प्रकाश है कि कुछ चूहे उसकी चकाचौंध से डर कर
गहरी बिलों में घुस गए हैं
और वहाँ बैठे-बैठे आग-आग’ चिल्ला रहे हैं।  
दूरियां सिमिट रही हैं।  सीमाएं ढह रही हैं।  
इस दुनिया में शुभ-अशुभ, अच्छे-बुरे  
के भेद धुन्दले पड़ गए हैं।
पुराने सभी पुराण और सस्कृतियां,
सभ्यताएं, कलाएं, कथाएं,
और बड़ी से बड़ी मान्यताएं,
मिथक बनती जा रही हैं।  
और तुम खुद?
तुम्हारा खुद का कायाकल्प हो रहा है।
साइंस ने तुम्हें निरोग कर दिया है;
तुम्हारी उमर लम्बी कर दी है।
तुम्हारी सोच तक को बदल दिया है।
तुम पहले वाले तुम नहीं रहे।
और यह सब हुआ है तुम्हारी साइंस की बदौलत।


(10)  जांत-पांत के भेद मिट रहे हैं।
अगले बीस-तीस सालों में
तुम यह भी भूल जाओगे कि तुम हिन्दू थे,
मुस्लमान थे, बौद्ध थे, या ईसाई।  
अगले तीस -चालीस सालों में
तुम अपने को हिंदी,
चीनी, पाकी या अमरीकी भी नहीं बताओगे।  
तुम पृथ्वी के नागरिक हो जाओगे।  


(11)  तुम्हारी जन-संख्या बढ़ रही है,
इसमें कोई संदेह नहीं,
लेकिन तुम्हारी साइंस और टेक्नोलोजी की बदौलत
अन्न-जल, सुख-सुविधाओं और सेवाओं का उत्पादन
और भी तेज़ी से बढ़ रहा है।
अगले चालीस-पचास सालों में
आबादी का बढ़ना रुक जायेगा,
लेकिन उत्पादन का बढ़ना नहीं रुकेगा।
वह इतना बढ़ जायेगा कि तुम माला-माल हो जाओगे।
किसी आवश्यक वास्तु की कमी नहीं रहेगी
और सब झग़ड़े-फ़साद और छीना-झपटी ख़त्म हो जायेगी,
पूरी मानव जाति आपस में घुल-मिल कर एक जुट हो जायेगी।
जो आज खिचड़ी है वह कल खीर हो जाएगी।  


(12) लेकिन, हे मानव, आज पृथ्वी पर,
और उसके प्राणीजगत पर, कई खतरे मंडरा रहे हैं।
बढ़ती हुई जन-संख्या अपने-आप में एक खतरा है।
प्रकृति का संतुलन बिगड़ रहा है।
प्रदूषण के कारण तापमान चढ़ रहा है।
नदियां सूखती जा रही हैं।
पीने का पानी दुर्लभ और दुर्गम होता जा रहा है।
प्राणियों की हज़ारों प्रजातियां
देखते-देखते समूल नष्ट हो रही हैं।
पृथ्वी का जीवजगत् चरमर्रा रहा है।
कुछ पुराने लोग लोभ और भय से अंधे हो कर
आपस में लड़-मर रहे हैं।
एक-दूसरे का सर्वनाश करने के लिए
उन्होंने इतने बम बना लिए हैं कि
पृथ्वी की पूरी सतह को, एक बार नहीं,
कई बार जला कर राख कर दें।
इन खतरों से पृथ्वी की रक्षा करना
आज तुम्हारी जिम्मेदारी हो गयी है।
केवल तुम्हारी।  



(13) हे मानव,
तुमने अनगिनत संकटों को झेला है।
तुम्हारे पास अरबों पीढ़ियों का अनुभव है।
तुम में जीने की दृढ़ इच्छा है।
तुम संवेदनशील हो, विचारशील हो
और दूरदर्शी भी।
तुम्हारे पास अद्भुत साइंस है अतिकुशल टेक्नोलॉजी है।
पूरे पशुजगत में केवल तुम्ही एक पशु हो जो,
पेड़ों की तरह, अपना भोजन स्वयं उगाने लगे हो।
केवल वही खाते हो जो खुद उगाते या पालते हो
और उतना खाते हो जितना खुद पैदा करते हो।
पृथ्वी के वातावरण को अनुकूल बनाये रखने
और पूरे प्राणीजगत की रक्षा करने में तुम सक्षम हो।

(14) पिछली दो-तीन सदियों में यह दुनिया
नयी एक दुनिया हो गई है।
तुम इस दुनिया के नए खुदा हो।
आज तक तुम डरते रहे हो,
बच-बच कर जीते रहे हो,
केवल अपनी रक्षा-भर करते रहे हो,
अब जीयो, जी भर कर जीयो,
जीने का भरपूर आनंद लो,
और अन्य प्राणियों को भी जीवन दान दो;
प्राणीजगत की रक्षा करो;
पृथ्वी के वातावरण की रक्षा करो;
पूरी पृथ्वी को अपने आँचल की ओट में ले लो, भगवन।
तुम्हारी जय हो।
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- बलदेव राज दावर - मार्च 2014



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