Hum se Miliye
है बेहिसाब मुहब्बत मेरी बाँहों में/ हम से मिलिए उसी हिसाब से मिलिए//
बूढ़े पिंजेर हैं उधर, ढीले ढाले/ आइये आइये इधर, शबाब से मिलिए//
बुझेगी प्यास न यह मै के पैमानों से/ हम से मिलिए, नदी शराब से मिलिए//
उड़ती उड़ती सुनी पे मत जाइये/ जिन पे गुजरी है उन जनाब से मिलिए//
पूछ रहा था जिसे सदियों से जहाँ/ उस सवाल के दो टूक जवाब से मिलिए//
हमारा हुस्न और नूर, है तूर का जलवा/ हम से मिलिए ज़रा आदाब से मिलिए//
किसी खुदा का नहीं, यह आसमां तुम्हारा है/ उठो जमीं से उठो, आफताब से मिलिए//
खुद-खुदाओं का नहीं दवार कायल/ नए खुदा के नए इन्तखाब से मिलिए//
- बलदेव राज दवार, ९/२००९


1 Comments:
खुद-खुदाओं का नहीं दवार कायल
नए खुदा के नए इन्तखाब से मिलिए
शानदार ग़ज़ल!!! ग़ज़ल और आपके पोस्ट्स के जरिये ही सही पर मिल बहुत अच्छा लगा.
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