Monday, October 3, 2011

Hum se Miliye

हम से मिलिए

हम से मिलिए, किसी नवाब से मिलिए/ हँसते महकते इक गुलाब से मिलिए//


है बेहिसाब मुहब्बत मेरी बाँहों में/ हम से मिलिए उसी हिसाब से मिलिए//

बूढ़े पिंजेर हैं उधर, ढीले ढाले/ आइये आइये इधर, शबाब से मिलिए//

बुझेगी प्यास न यह मै के पैमानों से/ हम से मिलिए, नदी शराब से मिलिए//

उड़ती उड़ती सुनी पे मत जाइये/ जिन पे गुजरी है उन जनाब से मिलिए//

पूछ रहा था जिसे सदियों से जहाँ/ उस सवाल के दो टूक जवाब से मिलिए//

हमारा हुस्न और नूर, है तूर का जलवा/ हम से मिलिए ज़रा आदाब से मिलिए//

किसी खुदा का नहीं, यह आसमां तुम्हारा है/ उठो जमीं से उठो, आफताब से मिलिए//

खुद-खुदाओं का नहीं दवार कायल/ नए खुदा के नए इन्तखाब से मिलिए//

- बलदेव राज दवार, ९/२००९

1 Comments:

At December 5, 2011 at 7:12 AM , Blogger Fani Raj Mani CHANDAN said...

खुद-खुदाओं का नहीं दवार कायल
नए खुदा के नए इन्तखाब से मिलिए

शानदार ग़ज़ल!!! ग़ज़ल और आपके पोस्ट्स के जरिये ही सही पर मिल बहुत अच्छा लगा.

 

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