Tuesday, January 15, 2008

You are not alone

तू अकेला नहीं

जिस खाल के अंदर तू रहता है वह तेरे सैल्फ की सीमा नहीं।
जिस काल में तू जी रहा है वह भी तेरी हस्ती की पहली या आख़िरी घड़ी नहीं।
तू अपने को क्षुद्र या क्षण-भंगुर प्राणी न समझ।
तू अकेला नहीं; तू अलग नहीं; न ही तू स्वतंत्र है।
तेरी हर धड़कन, तेरी हर साँस; और तेरी हर सोच
समूचे प्राणीजगत की धड़कनों, सांसों और सोचों का एक हिस्सा है।
... इस लिए, हे अर्जुन, जिस जल की तू मछली है
उस जल को अपने शरीर से पोंछने की बेकार कोशिश न कर।
कछुए की तरह अपने को समेटने की चेष्टा न कर।
बल्कि अपने को ढीला छोड़ दे।
जिस सरोवर में तू रहता है उसमें अपने को शरबत की तरह घोल दे।
फिर देख अपने विराट और विशाल रूप को
और महसूस कर कि तेरा विस्तार कहाँ तक फैला हुआ है।

---बलदेव राज दावर कृत
'विज्ञान गीता' के १८वेँ अध्याय से

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