ग़ज़ल
हम से मिलिये किसी नव्वाब से मिलिये
हंसते महकते इक गुलाब से मिलिये
है बेहिसाब मुहब्बत हमारी बाँहों में
हम से मिलिये उसी हिसाब से मिलिये
बूडे पिंजर हैं उधर ढीले-ढाले
आइये आइये इधर शबाब से मिलिये
बुझेगी प्यास न मै के पैमानों से
हम से मिलिए नदी शराब से मिलिये
उड़ती उड़ती सुनी पे मत जाइये
जिन पे बीती है उन जुनाब से मिलिये
पूछ रहा था जिसे सदियों से जहाँ
उस सवाल के दो टूक जवाब से मिलिये
किसी खुदा का नहीं, अस्मां हमारा है
उठो जमीं से उठो, आफ़ताब से मिलिये
हमारा हुस्सन औ नूर, है तूर का जलवा
गले मिलिये मगर आदाब से मिलिये
खुद-खुदाओं का नहीं दावर कायल
नए खुदा के नए इन्तखाब से मिलिये
- बलदेव राज दावर

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