Thursday, January 10, 2008

ग़ज़ल

हम से मिलिये किसी नव्वाब से मिलिये
हंसते महकते इक गुलाब से मिलिये

है बेहिसाब मुहब्बत हमारी बाँहों में
हम से मिलिये उसी हिसाब से मिलिये

बूडे पिंजर हैं उधर ढीले-ढाले
आइये आइये इधर शबाब से मिलिये

बुझेगी प्यास न मै के पैमानों से
हम से मिलिए नदी शराब से मिलिये

उड़ती उड़ती सुनी पे मत जाइये
जिन पे बीती है उन जुनाब से मिलिये

पूछ रहा था जिसे सदियों से जहाँ
उस सवाल के दो टूक जवाब से मिलिये

किसी खुदा का नहीं, अस्मां हमारा है
उठो जमीं से उठो, आफ़ताब से मिलिये

हमारा हुस्सन औ नूर, है तूर का जलवा
गले मिलिये मगर आदाब से मिलिये

खुद-खुदाओं का नहीं दावर कायल
नए खुदा के नए इन्तखाब से मिलिये

- बलदेव राज दावर

1 Comments:

At January 14, 2008 at 10:35 PM , Blogger Unknown said...

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